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भारतीय गिरमिटिया मजदूर और उनके वंशज

 

My book Bharatiya Girmitiya Mazdoor Aur Unke Vanshaj" published by Satsahitya Prakashan, Delhi and marketed by Prabhat

Prakashan New Delhi. The book is also available on amazon.in and amazon.com.

 

 

 

 

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Some of the comments of readers are as follows:

 

 

Rakesh Srivastava A very good book indeed to read several times. It reminds me the historical period which Winston Churchill forgot to mention about slavery in his book " History of English Speaking People".

 

Rakesh Srivastava, Professor of Electrical Engineering, I.I.T. BHU, Varanasi.

 

 

 

Ajai Singh “भारतीय गिरमिटिया मजदूर और उनके वंशज” एक अदभुत रचना है। यह एक ओर हमारे विस्मृत बंधुओं के इतिहास का एक ईमानदार आख्यान है दूसरी ओर व्यक्तिगत पीड़ा की कथा है। पुस्तक बार-बार समिष्ट से व्यष्टि और व्यष्टि से समिष्ट का कलेवर धारण करती रहती है जिससे पठनीयता बहुत बढ़ जाती है।
दिनेश चन्द्र ने बेहद साफगोई से जहां आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक कारकों का अध्ययन कर इस विधि सम्मत मानव तस्करी के कारणों को ढ़ूढ़ने का प्रयास किया है वहीं त्याग, बलिदान, संत्रास, एकाकीपन, लघुता, पीड़ा और निरर्थकता जैसी भावनाओं को सीधे-सीधे व्यक्तियों के जीवन परिचय के माध्यम से डाल दिया है। अतः यह पुस्तक इतिहास, उपन्यास और जीवन परिचय के संशिलिष्ट रूप में उभर कर आया है। इसे पढ़कर कई भावनायें मुखरित होती हैं – भारतीय गुलामी का एक बर्बर रूप जिससे प्रायः हम अपरिचित ही है, एक ऐसी प्रथा जिसने आधुनिक गुलामी को कानूनबद्ध कर दिया, ब्रिटिश साम्राज्य का दोहरा चेहरा जो एक ओर गुलामी प्रथा समाप्त करने में विश्व का प्रथम राष्ट्र बनने का सेहरा बांधता है, दूसरी ओर गुलामी को एक दूसरा कानूनी रूप पहनाता है। जिससे उसके आर्थिक हित अक्षुण्ण रहे, भले ही मानवीय मूल्य गर्त में चले जायें।
इस पुस्तक का सर्वाधिक प्रभावी अंश उन भारतीयों की जिजीविषा है जो हजारों मील दूर अपरिचित, अति अमानवीय परिवेश में भी अपने सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक मूल्यों को सहेज कर रखते हैं। ये मूल्य जड़ नहीं है अपितु परिवेश से अनुकूलित होते रहते हैं। पुस्तक पढ़कर भारतीय पाठक के मन में एक अपराध भाव भी आता है कि हम अपने प्रवासी बन्धु-बान्धवों को लगभग भुला दिये हैं और मात्र सरकारों की पहल हेतु प्रतीक्षारत हैं।
पात्र तोताराम सनाढ्य, मणिलाल जी प्रशंसनीय है। नारायणी की व्यथा, रामदास की बेबसी, सरजू का स्वप्नभंग, गंगादेई के साथ हुआ विश्वासघात बेहद कारूणिक है। किन्तु ललिया के साथ हुआ विश्वासघात और पति से भौगोलिक समीपता रहते हुए भी आजीवन न देख पाने की क्रूर नियति झिंझोड़ कर रख देती है। इसी प्रकार कुंती का अटल साहस जिसे कविता द्वारा व्यक्त किया गया है :-
“सतियों का धर्म डिगाने को जब, अन्यायियों ने कमर कसी
जल अगम में कुंती कूद पड़ी, पर बही मझधार नहीं”
-जीवन के प्रति आस्था पुर्नस्थापित करती है।
दिनेश चन्द्र जी ने लगभग सभी ऐतिहासिक, विधिक तथ्यों का तमाम सामाजिक बुराईयों के साथ तट्स्थ भाव से समावेश कर दिया है। ऐसा लगता है जैसे कोई शल्य- चिकित्सक अपने प्रिय परिजन की शल्य चिकित्सा कर रहा हो।

 

Dr Ajai Singh, Additional General Manager, Small Arms Factory, Kanpur.

 

 

 

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